गर्भाधान संस्कार का वैज्ञानिक महत्व

 

सत्येन्दु शर्मा1 संजय चन्द्राकर2 एवं ज्योति रवि तिवारी3

 

1विभागाध्यक्ष (संस्कृत) शास. दू.. महिला स्नात. महाविद्यालय, रायपुर, (.

2सहा. प्राध्यापक (समाजशास्त्र) शास. दू.. महिला स्नात. महाविद्यालय, रायपुर, (.

3संकायाध्यक्ष (गृहविज्ञान) शास. दू.. महिला स्नात. महाविद्यालय, रायपुर, (.

 

प्रस्तावनारू

आदिम युग में सहवास एवं प्रसव भले ही एक स्वाभाविक कर्म रहा हो, लेकिन वैदिक काल से विकसित होते हुए गृह्यसूत्रकाल तक गर्भाधान एक सुव्यवस्थित संस्कार के रूप में प्रतिष्ठित हो चुका था।  गृह्यसूत्रोें के अनुसार पति मनोवांछित पुत्र- पुत्री प्राप्ति के लिए व्रत धारण करता था, व्रत की समाप्ति पर अग्नि में पक्कान्न की आहुति दी जाति थी और तब वैदिक ऋचाओं का गान करता हुआ पति अपनी सुसज्जित पत्नी में गर्भाधान करता था।

 

धर्मसूत्रों और स्मृति ग्रन्थों में गर्भाधान संस्कार का और भी विस्तृत निर्देश उपलब्ध होता है। इन ग्रन्थों में गर्भाधान के समय की उपयुक्तता और विधि पर सूक्ष्मतापूर्वक विचार किया जाता है। मनुस्मृतिकार पत्नी के ऋतु- काल की प्रथम चार रात्रि, ग्यारहवीं तथा तेरहवीं रात्रि का निषेध कर शेष दस रात्रियों को इस संस्कार के लिए प्रशस्त बतलाता है।

    

           तासामाद्यश्चतस्रस्तु निन्दितेकादशी या।

           त्रयोदशी शेषास्तु प्रशस्ताः दश रात्रयः।। मनु-3.47

 

इसके अतिरिक्त अष्टमी, चतुर्दशी, अमावस्या, पूर्णिमा एवं सम्पूर्ण पर्व की रात्रियाँ भी इस कार्य के लिये निषिध्द मानी गई हैं -

 

           अमावस्यामष्टमीं पौर्णमासीं चतुर्दशीम्।

           ब्रह्मचारी भवेन्नित्यामप्यृतौ स्नातको व्दिजः।। मनु- 4.128

           पर्ववर्जं व्रजेच्चैनां तद्व्रतो रतिकाम्यया। मनु-3.45

 

महर्षि याज्ञवल्क्य शास्त्रविहित रात्रियों में भी मघा और मूल नक्षत्र के समय गर्भाधान का निषेध करते है-

           मघां मूलं वर्जयेत्।

 

भारतिय मनीषा मनोवांछित संतान - प्राप्ति हेतु यह परामर्श देती है कि पुत्रकामी को छठी, आठवीं, दसवीं, बारहवीं, आदि युग्म रात्रियों में गर्भाधान संस्कार सम्पन्न करना चाहिए और पुत्री चाहनेवालों को पाॅचवीं, सातवीं, आदि अयुग्म रात्रियों में-

 

           युग्मासु पुत्रा जायन्तेऽस्त्रियोयुग्मासु रात्रिषु।

 

वस्तुतः भारतीय शास्त्रों ने गर्भाधान कर्म को एक पवित्र संस्कार का स्वरूप प्रदान किया है। शास्त्रकारों की स्पष्ट मान्यता है कि सहवास काल में पति- पत्नी के विचार - व्यवहार भावी सन्तति  के संस्कार को पूर्णरूपेण प्रभावित करते हैं। केवल इन्द्रिय- सुख के उद्देश्य से सम्पन्न समागम के फलस्वरूप जो आकस्मिक गर्भाधान होता है, उससे धार्मिक, सदाचारी और यशस्वी सन्तान- प्राप्ति की आशा  नहीं की जा सकती। अतः सर्वगुणसम्पन्न संन्तान के लिए  गर्भाधान संस्कार में पति-पत्नी के तन-मन की पवित्रता के साथ-साथ मांगलिक परिवेश और ईश्वराराधन का विशेष अनुरोध दिखलाई पड़ता है।

 

गर्भाधान के लिये सायंकाल निषिध्द समय माना गया है। एकबार दक्षपुत्री दिति ने कामसंतप्त होकर सायंकाल के समय ही अपने पति महर्षि कश्यप से पुत्र- प्राप्ति हेतु समागम की प्रार्थना की। महर्षि कश्यप ने इस कार्य के लिए  सायंकाल को अनुचित अवसर बतलाते हुए दिति से कुछ समय तक प्रतीक्षा करने का परामर्श दिया। लेकिन कामविह्वलतावश उचित- अनुचित का  विवेक करती हुई दिति ने हठपूर्वक पति के  साथ समागम किया। बाद में दिति इस निन्दित कर्म से स्वयं भी लज्जित होकर अपनी भावी संतान की चिन्ता करने लगी। किन्तु गर्भाधान - काल के दोषों का निराकरण अब संभव नहीं था। महर्षि कश्यप ने दिति से कहा कि तुम्हारा चित्त कामवासना से मलिन था और वह समय भी प्रशस्त नहीं था। तुमने मेरी बात नहीं मानी और इसलिये तुम्हारे गर्भ से दो बड़े अमंगलमय और अधम पुत्र उत्पन्न होंगे, जो सम्पूर्ण लोक और लोकपालों को अपने अत्याचारों से रूलायेंगे-

 

      

     अप्रायत्यादात्मनस्ते दोषान्मौहूर्तिकादुत।

     मन्निदेशातिचारेण देवानां चातिहेलनात्।।

     भविष्यतस्तवाभद्रावभद्रे जठराधमौ।।

     लोकान् सपालांस्त्रींश्चण्डि मुहुराक्रन्दयिष्यतः।।

                भागवत पुराण-3.14.37,38

 

इस प्रकार मुहूर्त का अतिक्रमण करके कामविह्वल होकर पुत्रोत्पत्ति में प्रवृत्त होने वाली दिति ने हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु जैसे दो दैत्य पुत्रों को जन्म दिया।

 

महाभारत की कथा भी इस संदर्भ में उल्लेखनीय है। माता सत्यवती के आग्रह से महर्षि व्यास ने कुरूवंश में सन्तान- परम्परा की रक्षा के लिए अम्बिका के साथ समागम किया।किन्तु गर्भाधान- काल में महर्षि व्यास के काले रंग, जटाओं और दाढ़ी-मूँछ को देखकर अम्बिका ने भय के मारे अपनी आँखे बंद कर ली और माता के इस दोष से अन्धे बालक ध्रृतराष्ट्र का जन्म हुआ। इसी प्रकार महर्षि व्यास को देखकर अम्बालिका गर्भाधानकाल मे पाण्डुवर्ण की हो गई थी, इसलिये उसने पाण्डुवर्ण के पुत्र पाण्डु  को जन्म दिया। किन्तु, अम्बिका व्दारा अपने स्थान पर भेजी गई दासी ने महर्षि व्यास का बडे़ उत्साह से सत्कार और पूजन किया। गर्भाधान- काल में पूर्ण स्वस्थ एवं प्रसन्नचित होने के कारण उसने धर्मात्मा और बुध्दिमान् पुत्र विदुर को जन्म दिया। इसप्रकार गर्भाधान-काल में तीनों स्त्रियों की मनोदशाओं की भिन्नता के कारण तदनुरूप पुत्र उत्पन्न हुए। (महाभारत, आदिपर्व- सम्भवपर्व)

 

भागवत पुराण और महाभारत के ये दोनों आख्यान शास्त्रनिर्दिष्ट गर्भाधान संस्कार के वैज्ञानिक महत्व को प्रमाणित करते हैं। पति-पत्नी के गुण, संस्कार, आचरण, और अन्तःकरण की वृत्तियाँ भावी संतति के संस्कार निर्मित करती हंै। विशेषकर गर्भाधान-काल मंे दम्पती के संयुक्त कायिक-मानसिक विचारों के अनुरूप गर्भ का संस्कार होता है और वैसे ही पुत्र की प्राप्ति होती है। बल्कि सम्पूर्ण गर्भिणी माता के परिवेश, चिन्तन, विचार और आचरण से गर्भस्थ शिशु का स्थाई चरित्र निर्धारित होता है। दैत्यराज हिरण्यकशिपु की गर्भवती पत्नी को नारद ने भक्ति का उपदेश दिया था और गर्भस्थ प्रह्लाद उस उपदेश-श्रवण के फलस्वरूप जन्मतः ऐसे कट्टर हरिभक्त हुए, जिसे मृत्युभय भी विचलित नहीं कर सकता था। आधुनिक विज्ञान भी इस शास्त्रीय मत से सर्वथा सहमत है। अतः दैवी गुणसंपन्न, धार्मिक, यशस्वी संतान के लिये शास्त्रोक्त गर्भाधान संस्कार सर्वथा एक तथ्यपूर्ण और विज्ञानसम्मत अनुष्ठान है। सचमुच कर्दम समान महात्मा पति और देवहूति जैसी पतिपरायण शुध्दचित्तवाली पत्नी  के मिलन से ही साक्षात् भगवान् विष्णु (कपिल) का जन्म होता है।

 

संदर्भग्रंथः-

1 मनुस्मृति

2 याज्ञवल्क्यस्मृति

3 भागवतपुराण

4 महाभारत

 

Received on 02.11.2010

Accepted on 16.11.2010     

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Research J.  of Humanities and Social Sciences. 1(3): Oct.-Dec. 2010, 89-90